सार्वजनिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के अनाप-शनाप बयान,क्या अभिव्यक्ति की आज़ादी है …?

 सरकार बच गई। देश की तमाम सरकारें बच गईं। मंत्री कोई भी, कैसा भी बयान दे, इसके लिए सरकार ज़िम्मेदार नहीं होगी। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने कह दिया है कि बोलने की आज़ादी व्यक्ति की अपनी होती है, इसलिए कोई मंत्री, कोई ग़ैर ज़िम्मेदारी भरा बयान देता है या देती है तो इसके लिए वह स्वयं ही ज़िम्मेदार होगा।


मंजूलता शुक्ला

दरअसल, मामला मंत्रियों या सार्वजनिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के अनाप-शनाप बयानों का था। याचिकाओं में माँग की गई थी कि ज़िम्मेदार पदों पर बैठे व्यक्तियों के ग़ैर ज़िम्मेदार
बयानों पर पाबंदी लगाई जाए। सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला दिया है कि बोलने की आज़ादी पर ज़्यादा पाबंदी नहीं लगाई जा सकती।

सही भी है, लेकिन मंत्रियों या ज़िम्मेदारों को तो खुद पर ही पाबंदी लगानी चाहिए। आख़िर वे इस तरह के पदों पर क्या बेतुके बयान देने के लिए ही बैठे हैं? दरअसल, लोगों के बीच या मीडिया में चर्चित होने के लिए ये नेता इस तरह की बेतुकी बयानबाज़ी करते रहते हैं। कभी-कभी अपने नेता या आलाकमान को खुश करने के लिए भी बेतुके बयान देते रहते हैं।

हैरत की बात यह है कि वे खुश होते भी हैं। आधिकारिक तौर पर पार्टी बयान जारी कर देती है कि ये उनके निजी विचार हैं। पार्टी से इसका कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन कुछ दिन बाद हम देखते हैं कि उसी बेतुके बयान के कारण वही नेता तरक़्क़ी पा जाता है। ऐसे में यह बेफिजूल की बयानबाज़ी रुकेगी कैसे? बढ़ेगी ही।

राजनीति में जब तक शैक्षणिक योग्यता तय नहीं होती, तब तक बेतुकी बयानबाज़ी पर रोक लगाना मुश्किल है। ऐसा नहीं है कि शिक्षित नेता बेतुके बयान नहीं देते, लेकिन कहीं, कोई तो नियम- क़ानून हो जिनके बूते पर कहा जा सके कि कभी तो इस तरह के बयानों पर लगाम लगेगी। वर्ना चारा क्या है?

पाँच सदस्यीय संविधान पीठ की एक जज ने ज़रूर कहा कि अगर कोई मंत्री अपमानजनक बयान देता है तो इस बयान के लिए उसकी सरकार को ज़िम्मेदार क्यों नहीं माना जाना चाहिए? हालाँकि यह बात केस बाय केस निर्भर करती है। कौन से बयान के लिए सरकार ज़िम्मेदार हो सकती है और कौन से बयान के लिए नहीं, यह उस वक्त ही तय हो सकता है।

ख़ैर, अब मंत्रियों की ग़लतबयानी से सरकारें बरी हो चुकी हैं और मंत्री तो कब से आज़ाद पंछी ही थे। अब और भी आज़ाद हो चुके हैं। उन्हें इस आज़ादी का इस्तेमाल जनता के हित में करना चाहिए। सभ्य भाषा बोलने के रूप में करना चाहिए, ताकि लोगों के मन में वे जगह बना सकें।

(लेखिका समाजिक कार्यकर्ता,धार्मिक मामलो की जानकार एवं राष्ट्रीय विचारक है )