साधना के भी हैं 4 आयाम, इस तरह ईश्वर को कर सकते हैं प्राप्त

ईश्वर भक्ति ,साधना,तप,और ज्ञान के बारे में बता रहे है भंते अरुण सिंह बौद्ध



साधना के भी चार आयाम हैं: साक्षी, ध्यान, सुमिरन और समाधि। पहली साधना है 'साक्षी', जिसके प्रणेता भगवान कृष्ण हैं। साक्षी का अर्थ है: बाहरी और आंतरिक- दोनों प्रकार की जागरुकता। यह संसार में जीने की सर्वोत्तम कला है।



दूसरी साधना है 'ध्यान' जो भगवान बुद्ध की देन है। भीतर की निर्विचार अवस्था यानी अपने निर्मल अंतरआकाश को जानना, जहां हम बाहर की सारी उत्तेजनाओं, विचारों, भावों और अशांति से मुक्त हो जाते हैं।



तीसरे प्रकार की साधना 'सुमिरन' है। सुमिरन का अर्थ है: निराकार में जाकर ओंकार और उसके विविध आयामों यानी निराकार के संगीत, प्रकाश, अमृत, स्वाद, सुगंध, खुमारी, ऊर्जा, प्रेम, स्पर्श और आनंद की दिव्यता को जानना। परमात्मा के जितने भी आयाम हैं, उनको जानना और उनके स्मरण में जीने का नाम ही सुमिरन है। सुमिरन का प्रवर्तक गुरु गोरखनाथ को कहा जा सकता है। कबीर, रैदास, दसों सिख गुरु साहिबान, दादू, दरिया, गुलाल, भीखा और पलटू जैसे सूफी सुमिरन की परंपरा के ही संत हैं।


चौथी साधना है 'समाधि'। पहली बार इसकी चर्चा पतंजलि ने की। पतंजलि ने इसे लय योग भी कहा है। साधना में परमात्मा के साथ एकरूपता हो जाती है। हम मिट जाते हैं, दो का भाव समाप्त हो जाता है, अद्वैत की अनुभूति होती है। जब ज्ञाता और ज्ञेय का भेद मिटता है, तभी यह अनुभूति होती है और साधक ब्रह्म के साथ एकरुपता का अनुभव कर पाता है। यही चारो साधनाएं वेदांत के असली अंग हैं। इन्हीं आयामों के माध्यम से वेदान्त का अनुभव होता है।