विजया एकादशी 2019: अशुभता का नाश कर शुभ फल देता है ये व्रत


नाम में ही छुपा है प्रभाव


विजया एकादशी अपने नाम के अनुसार विजय प्रादन करने वाली होती पद्म पुराण और स्कन्द पुराण के अनुसार भयंकर शत्रुओं से जब आप घिरे हों और पराजय सामने खड़ी हो उस विकट स्थिति में विजया नामक एकादशी आपको विजय दिलाने की क्षमता रखती है। जिसका अर्थ है क‍ि विजया एकादशी का व्रत करने से हर प्रकार की विषम परिस्थिति में भी विजय प्राप्त होती है। विजया एकादशी व्रत इस वर्ष 2 फरवरी, शनिवार को किया जाएगा। शास्‍त्रानुसार फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकाद्शी को विजया एकादशी के रूप में मनाया जाता है। मान्‍यता है कि श्री राम ने भी इस व्रत को धारण करके रावण को पराजित कर अपने विजय मनोरथ को पूर्ण किया था। एकादशी व्रत करने से व्यक्ति के शुभ फलों में वृद्धि होती है तथा अशुभता का नाश होता है।  विजया एकादशी व्रत करने से साधक को व्रत से संबन्धित मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। सभी एकादशी अपने नाम के अनुरुप फल देती है।


विजया एकादशी पौराणिक महत्व


विजया एकादशी का पौराणिक महत्व श्री राम से जुडा़ हुआ है जिसके अनुसार विजया एकादशी के दिन भगवान श्री राम लंका पर चढाई करने के लिये समुद्र तट पर पहुंचे। समुद्र तट पर पहुंच कर भगवान श्री राम ने देखा की सामने विशाल समुद्र है और उनकी पत्नी देवी सीता रावण कैद में है। इस पर भगवान श्री राम ने समुद्र देवता से मार्ग देने की प्रार्थना की। परन्तु समुद्र ने जब श्री राम को लंका जाने का मार्ग नहीं दिया तो भगवान श्री राम ने ऋषि गणों से इसका उपाय पूछा। ऋषियों में भगवान राम को बताया की प्रत्येक शुभ कार्य को शुरु करने से पहले व्रत और अनुष्ठान कार्य किये जाते है। व्रत और अनुष्ठान कार्य करने से कार्यसिद्धि की प्राप्ति होती है, और सभी कार्य सफल होते है। अत: आप भी फाल्गुण मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत विधिपूर्वक कीजिए। भगवान श्री राम ने ऋषियों के कहे अनुसार व्रत किया, जिसके प्रभाव से समुद्र ने उनको मार्ग प्रदान किया और यह व्रत रावण पर विजय प्रदान कराने में मददगार बना। तभी से इस व्रत की महिमा का गुणगान किया जाता है जो आज भी सर्वमान्य है और विजय प्राप्ति के लिये जन साधारण द्वारा किया जाता है।


 


विजया एकादशी पूजा विधि


विजया एकादशी व्रत के विषय में मान्यता है कि इसको करने से स्वर्ण दान, भूमि दान, अन्नदान और गौदान से अधिक पुण्य फल की प्राप्ति होती है। एकादशी व्रत के दिन भगवान नारायण की पूजा की जाती है। व्रत पूजन में धूप, दीप, नैवेध, नारियल का प्रयोग किया जाता है। विजया एकादशी व्रत में सात धान्य घट स्थापना की जाती है। सात धान्यों में गेंहूं, उड्द, मूंग, चना, जौ, चावल और मसूर है। इसके ऊपर श्री विष्णु जी की मूर्ति रखी जाती है। इस व्रत को करने वाले व्यक्ति को पूरे दिन व्रत करने के बाद रात्रि में विष्णु पाठ करते हुए जागरण करना चाहिए। व्रत से पहले की रात्रि में सात्विक भोजन करना चाहिए। एकादशी व्रत 24 घंटों के लिये किया जाता है। व्रत का समापन द्वादशी तिथि के प्रात:काल में अन्न से भरा घडा ब्राह्माण को दिया जाता है। यह व्रत करने से दु:ख दूर हो कर जीवन की कठिन परिस्थितियों में विजय मिलती है।


   इस व्रत के एक दिन पहले वेदी बनाकर उस पर सप्तधान रखें फिर अपने सामर्थ्‍य के अनुसार सोने, चांदी, तांबे अथवा मिट्टी का कलश बनाकर उस पर स्थापित करें। एकदशी के दिन उस कलश में पंचपल्लव (पांच तरह के पेड़ के पत्ते) रखकर भगवान श्री विष्णु की मूर्ति स्थापित करें और विधि सहित धूप, दीप, चंदन, फूल, फल एवं तुलसी से प्रभु का पूजन करें। व्रती पूरे दिन भगवान की कथा का पाठ एवं श्रवण करें और रात्रि में कलश के सामने बैठकर जागरण करे। द्वादशी के दिन कलश को योग्य पंडित अथवा किसी गरीब को दान कर दें।