अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष

(8 मार्च, महिला दिवस पर विशेष)
नारी दिवस बनाम वाचिक ब्लात्कार
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अनेक सभ्यताओं के दौर गुजरने के बावजूद मनुष्य आजतक स्वतः सभ्य नहीं बन पाया है। नारी विमर्श के संदर्भ में तो बिल्कुल नहीं। कब किसके अन्दर वही पुरानी जंगली अथवा जानवरी-प्रवृत्ति जाग जाए कुछ भी कहा नहीं जा सकता है।


   ये तो नारी की अपनी सुरक्षा कौशल है जिस कारण बहुत कुछ राहत में है अन्यथा पूजा स्थल, कार्यस्थल, शिक्षास्थल व यात्रास्थल पर हर मौके बेमौके पुरुष की लारटपकनी प्रवृति से नारी को असहज होना पड़ रहा है। यह बात दीगर है कि सभ्यता एवं विकास के नित नए आयाम रचने वाला मनुष्य आज भी नारी विमर्श के मुद्दे पर अंततोगत्वा उसी पुरानी दकियानूसी जमीन पर खड़ा नज़र आता है।


    बड़ी बड़ी डींग हांकने वाला मनुष्य "नारी की नथ" में फँसा-फँसा डोल रहा है। इसीलिए नर नारी सम्बन्धों की नई उड़ान के अंतिम पायदान पर भी लगभग लगभग वही परिदृश्य चित्रित होता दिखता है। सब कुछ के बावजूद सवाल खड़ा है कि आखिर सूर्यास्त के बाद रात के हल्के अँधेरे में भी हमारी बालाएं घर से सौ दो सौ मीटर दूर भी अकेले क्यों नहीं जा पा रही हैं? ये डर अँधियार का है, जानवरों का है अथवा मनुष्य का..?
नर नारी के इस जोर जुल्म के सम्बन्धों में जबतक पुरुष द्वारा सहमति के स्वर को पूर्ण अहमियत नहीं दी जाएगी तबतक स्थितियाँ कमोबेस वैसे की वैसे ही रहने वाली हैं। दूसरा मुद्दा है आर्थिक आज़ादी का। जबतक हर नारी की आर्थिक परतंत्रता बरकरार है स्थितियाँ वैसे की वैसे ही रहने वाली हैं।


    तीसरा मुद्दा है देह-सौंदर्य का। जबतक नर-नारी दोनों देह सौन्दर्य की पारम्परिक चिन्तन परक गुलामी से बाहर नहीं निकलेंगे तबतक भी स्थितियों में शायद ही कोई बदलाव आए। चौथा मुद्दा है विज्ञान और विकास के नए दौर में उपजी नई समझदारी के सापेक्ष दोनों के समझदार होने का।


    जहाँ जहाँ जिन अंशों में उपरोक्त बदलाव आए हैं जोरजुल्म की घटनाओं में बेहद कमी आयी है। कानून का भी प्रभाव है जिससे समाज में एक सार्थक दबाव के चलते घटनाओं में पर्याप्त कमी आयी है। किंतु कांनून के डर से घटनाओं में कमी आना तथा स्वतः समझदारी के कारण घटनाओं में कमी आना दोनों की आंतरिक प्रकिया में अंतर है। 


    आज भी पुरुष द्वारा किसी को भी अवचेतन के प्रभाववश, स्वतः प्रवाह में अथवा पारम्परिक-आदतन दी जाने वाली "माँ बहन बेटी" संबोधन वाली भद्दी गालियाँ अपने आप में बहुत कुछ बखान करने को पर्याप्त हैं।


    यही वो प्रमाण है जिससे नारी के प्रति पुरुष मन-मस्तिष्क में विद्यमान सूक्ष्म मानसिकता के भयंकर रूप की झलक मिलती है। एक खुला अभियान चलाए जाने की महती आवश्यकता है कि माँ बहन बेटी संबोधन से दी जाने वाली गालियों को रोका जाए। क्या नारी दिवस के अवसर पर पुरुष अपने अवचेतन में कालांतर से कब्जा जमाये इस प्रवृत्ति को मिटाने का ये संकल्प ले सकेंगे..? यदि हाँ तो नारी दिवस की सार्थक और बड़ी उपलब्धि होगी।



नारी पीड़ा और नारी विमर्शों की बड़ी लेखिका दीदी मैत्रेयी पुष्पा जी ने "माँ बहन बेटी" के संबोधन से दी जाने वाली इन सभी असभ्य और भद्दी गालियों को वाचिक-बलात्कार कहा है। आये दिन खुल्लम खुल्ला सड़क अस्पताल घर और हर जगह ये वाचिक बलात्कारी अपनी आदतवश ये घिनौने व असभ्यता के प्रदर्शन करते मिल जाते हैं।


   जब एक पुरुष दूसरे पुरुष को ही माँ बहन बेटी के साथ असतस कर डालने की गाली देता है तो और यदि गाली खाने वाले पुरुष की माँ बहन बेटी सुने तो वाकई मैत्रेयी पुष्पा की बात सच साबित होती है। न भी सुने तो भी गाली देने वाला पुरुष अपनी सोच अपने चरित्र का प्रमाणपत्र दे ही रहा होता है। ऐसे में समूची मानवीय सभ्यता की ऊंचाई भरभराकर ढहती नजर आती है।


 और अंत मे पुनः...


अंतराष्ट्रीय महिला दिवस पर सभी मातृशक्ति को समर्पित🍁🍁


माँ तू आदि है, तू अनंत है,🌷🌷


तू सृष्टि है, तू ही वृष्टि है,🌹🌹


माँ तू ही पालन है, तू ही तारण है,🌼🌼


माँ मेरे इस जीवन का तू ही कारण है।


।। शुभ दिवस, जय श्री राम🚩🚩।।
🍁🍁🌷🌷🌹🌹🌼🌼🌸🌸